भाग-1
भ्रष्टाचार संबंधी समस्याओं पर अगर हम निगाह डालें व चिंतन करें तो हमें कुछ ऐसे दृश्य नज़र आयेंगे, जिसमें हमारे देश में मौजूद IAS, IPS अधिकारी व घमण्ड के नशे में चूर वे खद्दरधारी नेता नजर आयेंगे, जिनमें से ८०% परिवारों की महिलाओं के शरीरों पर ऐसे-ऐसे लाल नीले निशान नजर आयेंगे, जो अपनी कहानी खुद ही बयाँ कर रहे होंगे, यहाँ तक की इन अफसरों के माता-पिताओं की दशा भी कुछ इनसे अलग नहीं होगी।
यह हकीकत अगर हम निकालने जायें, तो इनके यहाँ नौकरी करने वाले नौकरों की वह फौज, जिनके शरीर के ऊपर भी ऐसे लाल नीले निशान नजर आयेंगे और अगर वे लोग अपनी ज़बान खोलें, तो हर अफसर की घिनौनी सड़ी हुई मानसिकता की कहानी पन्नों को भरती चली जायेगी।
अगर हम चिंतन करें व सोचें तो हमें नजर आयेगा कि हमने अपने भरण-पोषण व सुरक्षा का दायित्व ऐसे राक्षसी प्रवृत्ति के रावणों को दे रखा है, जो राक्षसी प्रवृत्ति के होने की वजह से कभी आपके उत्थान के बारे में सोचेंगे ही नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ व आपको गुलाम कैसे बनाए रखा जाये, इस प्रकार के षडयंत्रों में लिप्त रहेंगे।
अगर देखा जाये तो आज हम अपनी आने वाली नयी पीढ़ी का कुछ इस तरीके से ही पालन पोषण करते हैं जिसमें एक छात्र जब स्कूल से घर आता है तो जूतों के साथ ऐसे पसर जाता है और माँ के साथ नौकरों जैसा बर्ताव करते हुये पानी लाने का आदेश देता है, जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत कर आया हो और अगर कोई छात्रा स्कूल से आती है, अगर वह थोड़ी सी देर कुर्सी पर बैठकर आराम करने की सोचती भी है, तो बड़े-बूड़े माँ-बाप का आदेश मिलता है कि महारानी के समान आकर बैठ गई, जैसे बहुत बड़ी जंग जीतकर आई हो जल्दी करो, कपड़े बदलो व किचन में जाओ और बर्तन धो, क्या तुम्हारा बाप बर्तन धोयेगा ? आदि।
यह मानसिकता हमें किस दिशा की ओर ले जा रही है, माँ-बाप अपने बेटे को ज्ञानी बनाने के लिये उसकी हर जायज़-नाजायज़ फरमाईश को नौकरों के समान पूर्ण करने की कोशिश करते हैं, जिसमें वह बड़े-बड़े लड़कों के जूते उतारने व पहनाने के काम करने से भी नहीं हिचकते, जिसका साफ मतलब है, कि उन्होंने लड़कों को राजकुमार के समान पाला, जिसमें उन्होंने लड़कों को खुद स्वावलंबी बनाने के बजाए उनको तैयार करने में अपना सहयोग दिया, जबकि इसी जगह पर लड़की को भाई की दासी बनाने में संकोच नहीं करते, अगर हम अपनी भावी पीढी को ज्ञानी बनाने के चक्कर में राक्षसी प्रवृत्ति का रावण बना दें तो क्या वह अपने ज्ञान का उपयोग भलाई के काम में करेगा। क्या हम अपनी सोच को बदल नहीं सकते ? और हम अपनी भावी पीढ़ी को श्रीराम या श्रवण कुमार बनाने की प्राथमिकता दें, न कि ज्ञान के चक्कर राक्षसी प्रवृत्ति का रावण।
हम अगर पुराने जमाने को याद करें, तो पायेंगे कि उस जमाने में ऐसे गुरूकुल होते थे, जिसमें राजकुमार या गरीब के बेटा, गुरूओं की नज़र में एक समान होते थे। इसका मतलब है, कि शौचालय को साफ-सफाई करनी हो, चाहे झाड़ू-पोछा लगाना हो, चाहे झूठे बर्तन की सफाई करना हो वह सारे काम ऊँच-नीच, जात-पात या छोटे-बड़े को देखे बिना हर कार्य को करना प्रत्येक शिष्य की जिम्मेदारी होती थी और वे इसे सहजता से निभाते थे।
आज अगर हम सोचें तो पायेंगे कि क्या कभी हमने लड़के से घर की साफ-सफाई या शौचालय को साफ करने के लिये कहा भी है ? जबकि लड़कियाँ ३-४ साल की ही नहीं हो जातीं, तभी से हम उनसे वे सारे घरेलू काम करवाना शुरू करवा देते हैं, जैसे भाई को पानी दो, गन्दगी को साफ कर दो, इधर सफाई कर दो, मतलब कि हमने अपने लड़कों को मालिक व खुद और लड़के की बहनों को दासी बना लिया। अगर कोई व्यक्ति अपने लड़के से साफ-सफाई या बर्तन वगैरह साफ करवाता है, तो ऐसे परिवार को अधिकांशतः सज्जन बुद्धिजीवी वर्ग पागल कहने से नहीं हिचकता।
यहाँ तक कि अपना खुद का परिवार ही इस बात को पचा नहीं पाता जैसे हमारे ही परिवार में जब मैं अपने ससुराल गई तो हमने अपने बेटे से पानी मँगवाया व थोड़ी साफ-सफाई का काम करवाया, तो मेरे जेठ जी के बेटे ने आकर कहा "क्या आप लोगों ने सोमू को नौकर बना रखा है" यही मानसिकता हमारे देश के अधिकांशतः परिवार की है और इसी वजह से हमारे देश में IAS, IPS की ८०% लॉबी राक्षसी प्रवृत्ति की है व वह देश को लूटने के कामों में लगी हुई है, यहाँ हमने भतीजे से कहा कि "बेटा, अगर हम अपने घर का काम खुद करते हैं, तो क्या हम नौकर बन जायेंगे, आपकी मम्मी भी घर का काम करती हैं तो क्या वो आपकी नौकर हैं" जिसका जवाब उसने नहीं दिया और भाग गया।
इन सब माहौल का अगर हम बैठ कर चिंतन करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे, कि जैसे अगर हम अपने घर में पनप रहे छोटे से पीपल के पेड़ को मकान में गहरी जड़ें फैलाने से पहले ही नष्ट कर दें, तो वह पेड़ बड़ा होकर हमारे मकान को नुकसान नहीं पहुँचायेगा, अगर हम उसको अन्देखा करते हैं व उस पर अंकुश नहीं लगाते हैं तो उस पेड़ की जड़े पूरे मकान में फैल चुकी होंगी और उस वक्त हम अगर पेड़ को नष्ट करेंगे तो मकान को भी काफी हद तक नुकसान पहुँचेगा। अगर देखेंगे तो पायेंगे कि पेन्सिल चुराते अपने बच्चों को वक्त पर अगर रोक लगाई होती, तो वह बड़ा होकर कम से कम गुण्डा-बदमाश या चोर-उचक्का तो नहीं बनता।
अगर हम बच्चों को बचपन से ही अच्छे आचरण व संस्कार दें तो वे इस देश के ऐसे भविष्य निर्माता बन सकते हैं, जो देश को दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से उन्नति की ओर ले जायेंगे और ऐसे भविष्य निर्माताओं को तैयार करने के लिये हमें कुछ ऐसे क्रान्तिकारी कदम उठाने होंगे, जो शायद आज आप लोगों को लगे कि यह तो पागलपन की बातें हैं, जैसे हर मौहल्ले में आदर्श बेटे-बेटियों की ऐसी प्रतियोगिता हो, जिसमें मकान के अन्दर किये गये वह सारे कार्य कि सुबह उठ कर माँ-बाप के पाँव छूना, घर की साफ-सफाई करना, शौचालय की सफाई करना, बर्तन, झाडू-पोछा करना, बड़े-बुजुर्गों को पानी इत्यादि पहुँचाना व बुजुर्गों के पाँव दबाने संबंधी कार्य करवाना।
यकीन मानिये कि पूरे देश में लगभग ६० से ७०% श्रीराम व श्रवण कुमार बनना जरूर शुरू हो जायेंगे और अगर आज के गुरूकुलों में ऐसा नियम बनायें, जिस का मूल मकसद यह हो, कि हमारे गुरूकुल में ज्ञानी रावण नहीं, बल्कि श्रीराम या श्रवण कुमार बने। भले वह ज्ञान में काफी हद तक कमजोर ही क्यूँ न हों।
इसका मतलब है, कि जैसा आज गुरूकुल में कहा जाता है, कि हिन्दी में आदरणीय मत कहो नहीं तो सजा प्राप्त होगी, भले ही आप अंग्रेजी में कितनी ही गन्दी से गन्दी गाली दो, हम आपको पुरस्कृत करेंगे। अतः हम अगर गुरूकुलों में एक क्रान्तकारी कदम उठाते हैं, जिसमें चाहे करोड़पती का बच्चा हो या चाहे गरीब का, वह सब आपस में मिलकर गुरूजनों का नियमानुसार प्रतिदिन पाँव छूकर अभिनंदन करें व शुरूआत का एक घण्टा पूरे स्कूल की साफ-सफाई व शौचालय की साफ-सफाई का नियमानुसार पालन करें, जिससे इस भावी पीढी के स्वभाव में कोमलता आये व वे अहिंसक प्रवृत्ति को अपनायें और गरीबों को हीन भावना की दृष्टि से न देखें।
क्रमशः जारी .......
भाग – २
हमारे देश को सुखमय समृद्ध देश बनाने के लिये इस देश की प्रशासनीय व्यवस्था को संभालने वाले IAS, IPS व घमण्ड में चूर वे नेता नहीं बल्कि एक आर्दश श्रीराम व श्रवण कुमार जैसे सज्जन चाहिये मगर जब तक कि स्त्री शक्ति संचित नहीं होती है यह अभियान अधूरा ही रहेगा हमने स्त्रियों को मानसिक रूप से इतना मजबूत बनाना होगा, कि अगर एक स्त्री के साथ कई वहशी दरिन्दे बलात्कार करें फिर भी उसका मानसिक मनोबल इतना मजबूत रहे कि वे एक-एक दरिन्दे को चुन-चुन कर कानून के उन रखवालों के सामने अपराधी साबित करने में हिचकिचायें नहीं व इन अपराधियों के उन रक्षक व कानून के ज्ञाता (वकीलों) के सामने भी निर्भीक होकर खड़े रहें और उनके द्वारा दागे जा रहे लांक्षित सवालों के जवाब देने में दृढ़ता दिखायें।
मगर यह होगा कैसे? हमने सोच लिया और समाज ने उसे स्वीकार कर लिया? नहीं?
इस समाज के ठेकेदार इतनी आसानी से इस परिवर्तन को नहीं पचा पायेंगे और यह तभी हो सकता है जब सभी स्त्रियाँ अपने आप को एकत्रित करके मजबूती के साथ सामने आयें। आज हमारे समाज के ठेकेदारों ने हम स्त्रियों के मन में बचपन से ही एक भय का माहौल पैदा किया हुआ है "जैसे किसी ने कुछ कर दिया तो तुम्हारी शादी नहीं होगी", "अगर कभी झूठी बदनामी कर दी तो तुम किसी को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहोगी", ।
यदि किसी रिश्तेदार ने बलात्कार किया तो स्त्री को ही चुप रहने की सलाह दी जायेगी और कहा जायेगा कि "आवाज की, तो तुम्हारी तो बदनामी होगी ही साथ ही हमारे पूरे परिवार की भी बदनामी होगी", "माँ-बाप किसी के सामने सिर नहीं उठा पायेंगे, भाई-बहनों की शादी नहीं होगी", जिसकी वजह से स्त्री को झुक कर अपने ऊपर किये गये शोषण को स्वीकार करना पड़ जाता है।
माहौल ऐसा है, कि अगर कोई स्त्री सोचे भी कि वह शिकायत करे तो एक तो उसे ज्ञान नहीं होता कि क्या करना चाहिये और अगर वह किसी पुरूष को अपने साथ ले जाकर शिकायत दर्ज करवाने की कोशिश करती है, तो पुलिस वाले या समाज उस पुरूष को boyfriend या प्रेमी कहकर मजाक उड़ाते हुये कहते हैं, कि "इस मामले में दोषित व्यक्ति की तरफ से कोई आर्थिक सहयोग न मिलने की वजह से इल्ज़ाम लगाने आये हैं और दोषित व्यक्ति को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है" यह कहकर उस स्त्री के मनोबल को कमज़ोर किया जाता है।
परिणाम यह होता है, कि १००० में से एक महिला पुलिस थाने पहुँच पाती है और एक लाख में से एक महिला कोर्ट पहुँच पाती है। यही वजह है कि हमारे समाज में स्त्रियाँ पूरी तरीके से शोषित होकर जीने के लिये मजबूर हैं। देखा जाये, तो एक मजबूर शोषित स्त्री के, शोषित होने की वजह से आने वाली नई पीढ़ी में भी राक्षसी प्रवृत्ति व्याप्त होती है लड़का अगर बाप के द्वारा माँ को ड़ाँट-डपट व मारता हुआ देखता है तो उसके दिलो-दिमाग में स्त्री एक उपभोग की चीज व दासता की छवी के रूप में नजर आती है और यही हाल उस बच्ची का होता है, वह भी भाई व पिता की दासता की शिकार रहती है और जो उसके मनःमस्तिष्क में घर कर जाती है।
परिणाम वह अपने खुद के बारे में सोचने की क्षमता खो देती है और मन में घुमड़ते वह विचार कि "मैं यह कर सकती हूँ, मैं वह कर सकती हूँ" वह सब पति व सास-ससुर के तानों के दबाव की वजह से अंधकार में कहीं विलीन हो जाते हैं।
समाज के ठेकेदार यह कहेंगे कि अगर स्त्री मनःमस्तिष्क से मजबूत बन जायेगी तो तलाक की स्थिती जो आज काफी कम है वह ७०-८०% तक पहुँच जायेगी। लेकिन अगर हम चिंतन करें और इस बिन्दु पर ध्यान दें, तो हम पायेंगे कि शोषण को आत्मसात करते हुये व तलाक न पाने की वजह से हमारी भावी पीढ़ी एक राक्षसी प्रवृत्ति की बनती जा रही है जिनमें ज्ञान तो भरपूर है, मगर स्त्री जाति, गुरूजनों व बड़े-बुज़ुर्गों के प्रति आदर सम्मान व संस्कार नहीं हैं।
अतः क्या हमारे इस समाज को ऐसे राक्षसी प्रवृत्ति के ज्ञानी रावण चाहिये। अगर हाँ, तो वे हमें इसी प्रकार देश में व्याप्त भ्रष्टाचारी रूपी प्रशासनीय व्यवस्था देंगे और महिलाओं के लिये आरक्षित सीटों पर महिलायें चयनीत होकर पुरूषों की कठपुतली बनते हुये शोषित होती रहेंगी।
आज स्थिती काफी बदल गई है। हम जानते हैं, कि काफी बदलाव आया है मगर आप लाख में से सिर्फ एक उदाहरण दिखा दें, जिसमें दस या बारह वर्ष के बच्चे नें घर के अंदर कभी भी साफ-सफाई, झाडू-पोछा, घर के शौचालय की सफाई या घर के झूठे बर्तन धोये हों, जबकि ऐसे परिवार जिसमें साफ-सफाई करने के लिये नौकर रखने की हैसियत न हो, ऐसे दस परिवारों में से आठ परिवारों में आपको ६ साल की उम्र से ज्यादा की लड़कियाँ घर के सारे काम करती नजर आयेंगी और साथ में पढ़ाई भी अच्छे नंबरों से करती हुई दिखाई दे जायेंगी, कारण क्या है, इसको बताने की जरूरत नहीं है।
इसी प्रकार वह परिवार जिसमें साफ-सफाई के लिये नौकर रखने की व्यवस्था है, वहाँ पहली बात तो साफ-सफाई के लिये महिला ही आयेगी और साथ में अगर उसकी छोटी बच्ची है ६-७ वर्ष की तो वह अपनी माँ का हाथ बटाँती नजर आयेगी इसमें बच्ची की बजाये लड़का नजर आया तो एक आश्चर्य वाली बात मानी जायेगी। आखिर यह भेद-भाव है या नहीं?
कब स्त्री को ऐसी स्वतंत्रता प्राप्त होगी जब वह खुद अपनी मर्जी से अपनी जिन्दगी की कहानी लिख सके और यह सब करने के लिये उसका शिक्षित व मन से मजबूत होना बहुत जरूरी है आप कहेंगे कि आखिर ऐसा कौन सा रास्ता है, जिसका इस्तेमाल करके स्त्रियों को मजबूत स्थिती में पहुँचा सकें।
एक ज़माना था जब किसी ने सोचा भी नहीं था, कि हमें उन अफसरों, नेताओं के द्वारा अर्जित सम्पत्ति को जाँचने का हक हासिल होगा, मगर आदरणीय डॉ. जयप्रकाश नारायण के ड्राफ्ट व आदरणीय अन्ना जी के अनशन की वजह से हम यह हक हासिल कर पाये और कभी किसी ने यह भी नहीं सोचा था, कि चुनाव के दौरान काले धन का उपयोग करके पैसे वाले लोग जो चुनाव जीतने का काम करते हैं, उस पर अंकुश लग पायेगा और उनके द्वारा प्रचार के लिये बर्बाद की जा रही काले धन की राशी पर रोक लग सकेगी, जिसमें डॉ. जय प्रकाश नारायण की खामोश क्रान्ति ने http://www.hindimedia.in/index.php?option=com_content&task=view&id=15845&Itemid=206 हमें ऐसे कानून को लागू करने का महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी प्रकार की क्रान्ति हम अगर स्त्री वर्ग के मन को मजबूत कर सकने के लिये उठायें, तो शायद कम से कम ६०-७०% स्त्रियों की मनःस्थिती मजबूत होगी, व वे इन समाज के ठेकेदारों व दरिन्दों से लोहा लेने को तैयार खड़ी दिखाई देंगी।
इसके लिये हमें एक क्रान्तिकारी कदम उठाना होगा, हमें बचपन से ही (२ से ३ वर्ष के बाद से ही) लड़कियों को बाहरी दुनिया की झलक दिखवाना शुरू करवाना चाहिये और उसके लिये सरकार को ऐसा नियम बनाना चाहिये, कि जब यह बच्चियाँ घर से बाहर निकलें तो इन्हें सफर के लिये शासन के सभी यातायात के साधनों में किसी भी प्रकार का कोई भी शुल्क न लिया जाये व साथ में यात्रा करने वाले एक पुरूष का टिकट भी मुफ्त में दिया जाये।
जिससे लड़की का परिवार लड़की को साथ में बाहर की दुनिया दिखा सके व लड़की को बाहर के माहौल की झलक मिल सके, जिससे उनमें बातचीत करने, लोगों के चेहरों को पढ़ने, व उनका जवाब देने की काबलियत आ सके, जिससे वह उचित फैसले कर सकें, स्कूल कॉलेज की पढ़ाई पूरी तरह मुफ्त प्राप्त हो व २५ साल की उम्र तक उसे व उसके साथ यात्रा करने वाले एक पुरूष की यात्रा पूरी तरह मुफ्त हो यकीन मानिये जब हमारी भावी पीढ़ी इस माहौल में पल कर बाहर आयेंगी तो उसे कोई खद्दरधारी नेता सरपंच, पार्षद या MLA की उस कुर्सी पर बैठा कर अपनी उंगलियों पर नचाने की हिम्मत नहीं कर पायेगा और इस प्रणाली का उपयोग करने पर भ्रष्टाचार को दूर करने में कम से कम आधी जमात तो तैयार हो ही जायेगी क्योंकि हम जानते हैं, एक स्त्री जब शिक्षित होती हैं तो वह अपने साथ में तीन परिवारों को शिक्षित करती है।
अपने मायके को, अपनी ससुराल को व अपने बच्ची के ससुराल को आगे है …
भाग – ३
देश में व्याप्त भ्रष्टाचारी व्यवस्था का शिकार एक बड़ा वर्ग वह है, जो रोज कहीं न कहीं अपने ऊपर मौजूद कर्ज की वजह से आत्महत्याओं पर आत्महत्यायें कर रहा है, यह वर्ग वह वर्ग है, जिसमें साहूकारों द्वारा पीड़ित गरीब किसान, खुद को व देश को उन्नति के शिखर पर पहुँचाने की लालसा लिये, वह व्यवसायी, जो इस भ्रष्ट व्यवस्था की वजह से, उन भ्रष्टाचारी नेताओं के दलालों व बाहुबलियों के पास जाकर आवश्यकता से अधिक ब्याज पर कर्जा प्राप्त करते हैं, जिन्हें बाद में ऐसी स्थिती में पहुँचा दिया जाता है, जिसकी वजह से उन्हें आत्महत्या ही एक मात्र रास्ता नजर आता है, व वे लोग जिनसे बैंकों द्वारा ब्याज व जुर्माने के नाम पर ५% से १०% तक का ब्याज वसूला जाता है।
अगर हम चिंतन करें व इस बिन्दु पर ध्यान दें, जिसमें किसान जब आज की सोचता है, तो नजर आयेगा कि उसके पास कुछ जमीन खेती करने के लिये है, एक मकान रहने के लिये है, मगर वह अपना जीवनयापन करने की कोशिश करता है तो उसे भोजन इत्यादि की व्यवस्था करने के लिये आवश्यक धन की आवश्यकता पड़ती है और ऐसी परिस्थिती से लाचार इन गरीब किसानों पर उन गिद्ध के समान पैनी नगर रखने वाले उन भ्रष्ट नेताओं व साहूकारों की नजर पड़ी रहती है।
जो असल में उन्हें इस ढंग से षडयंत्र का इस्तेमाल करते हुये मजबूर करने की फिराक में लगे रहते हैं, जिससे वह मजबूर किसान अपनी जमीन व घर इन लोगों के पास गिरवीं रख दें, जिससे वे इन्हें अपनी पाँव की जूती के समान इस्तेमाल कर सकें व उनके घर की महिलाओं का शारीरिक शोषण कर सकें, इसके लिये वह अल्प समय के लिये बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाकर इन्हें धन उपलब्ध करवा देते हैं और Blank Stamp Paper पर हस्ताक्षर करवा लेते हैं।
जब यह लोग एक बार इनके चंगुल में फँस जाते हैं, तो इन्हीं को ब्लैकमेल कर उनके जरिये इन्हीं के जैसे नये भाइयों को फँसाने का काम करवाते चले जाते हैं, परिणाम, पूरा का पूरा मौहल्ला व गाँव अज्ञानता की वजह से इन लोगों के चंगुल में फँसा रहता है, फिर इन लोगों से कैसा भी जायज़-नाजायज़ काम करवाते रहते हैं, इसके अन्दर की कहानी तो बयाँ करने की जरूरत ही नहीं है, परिणाम, खुदखुशी के रूप में आता रहता है, ऐसी राजसी व्यवस्था इस देश के हर क्षेत्र में व्याप्त है, ठीक यही हाल शहरों में उन उद्यमियों के साथ होता है, जो अपनी व देश को अपना समझने की गलती करते हैं।
अगर हम कुछ उद्योग डालें तो उसकी वजह से कुछ नौकरीयाँ उत्पन्न होंगी व कुछ बेरोजगारी कम होगी जिसका साफ मतलब है, देश की तरक्की में योगदान देना, क्योंकि इस भ्रष्ट व्यवस्था की वजह से इन भ्रष्टाचारी नेताओं को जो देश को लूटने का काम कर रहे होते हैं, उन्हें तो बड़ी आसानी से कम ब्याज पर कर्जा प्राप्त हो जाता है, मगर इन देश की सेवा करने वाले देशप्रेमी उद्यमियों को किसी भी प्रकार का कर्जा प्राप्त नहीं हो पाता, परिणामस्वरूप, वे उन गिद्ध सी नजर रखने वाले दलालों व भाइयों की नजरों में आ जाते हैं, जो इनका शोषण कर सकें, वे उद्यमियों को कर्जा दिलवाने का काम करते हैं और इन उद्यमियों से २५ से ३०% तक कमीशन प्राप्त करते हैं और उस कर्जे का ब्याज भी साल का ३६% से ऊपर होता है, जो समय पर न चुकाने की वजह से साल का १५०% के आसपास चला जाता है, परिणाम, वह व्यक्ति कर्ज से पूरी तरह लद जाता है, फिर इन बाहुबली नेताओं के दलाल ५ से १०% के ब्याज पर कर्जा देकर उनके भगवान बनाने की कोशिश करते हैं।
अगर यह कर्जदार इन साहूकारों व बाहुबलियों के पाँव पूजने का काम करता रहता है, गाली खाने या जलील होने से नहीं हिचकिचाता है और अपनी मेहनत का ७०% से ८०% ब्याज के रूप में इन लोगों को देता रहता है और यह भ्रष्ट नेता लोग आराम से इन लोगों का शोषण करते रहते हैं, तब तक तो ठीक है, अगर इनमें से किसी ने भी आवाज उठाई तो इन कर्जदारों द्वारा दिये गये हस्ताक्षर किये हुये Blank Stamp Paper व Blank Cheque का उपयोग यह बाहुबली करते हैं।
इनके घर पर अपने दादाओं को भेजकर जलील करवाया जाता है, उनके घर से सामान उठा लिया जाता है और अगर इसकी शिकायत किसी पुलिस स्टेशन पर की जाये तो पुलिस न तो कोई कार्यवाही करती है और न ही शिकायत दर्ज करती है बल्कि इन्हें जलील करके मजाक उड़ाने का कार्य करती है परिणाम, कर्जदार परिवार के साथ खुदखुशी करता है।
इस तरह का पूरा जाल पूरे देश में फैला हुआ है हम ऐसे शोषित व्यक्तियों को एक मजबूर मनोबल देने की कोशिश करना चाहते हैं, जिसके अंतर्गत सबसे पहले वह अपने आप को यह समझायें कि जो उनके साथ बीत रहा है, या जो उनका शोषण हो रहा है, वह असल में उनकी खुद की गलती की वजह से नहीं है बल्कि इन भ्रष्टाचारियों द्वारा फर्जीवाड़ा करते हुये व कानून का मखौल उड़ाते हुये उनको इस जाल में फँसाया गया है।
इसको महसूस करने व समझने की जरूरत है, कि असल में आप अपराधी नहीं हैं, बल्कि वे साहूकार, बाहुबली, भ्रष्टाचारी नेता व बैंक (बैंक के अधिकारी जान बूझ कर जानते हुये कि उपभोक्ता के पास पूरा पैसा नहीं पहुँच रहा है और उपभोक्ता कम पैसा मिलने की वजह से वापस भी नहीं कर पायेगा उसके बावजूद अपनी व दलालों की जेब भरने के लिये इस प्रकार की deal को तरजीह देते हैं, बैंक को डुबाने का काम करते हैं और इल्ज़ाम कानून के मकड़जाल का इस्तेमाल करते हुये उपभोक्ता के ऊपर लगाते हैं, यह बैंक दादा, गुण्डे, मवालियों को कॉन्ट्रेक्ट देकर उपभोक्ता को जलील करवाते हुये पैसा वसूल करने का षडयन्त्र करते हैं) हैं।
अतः अपने आप को समझायें इसका एक बहुत ही आसान रास्ता है जिसका इस्तेमाल करके कर्ज की इस दलदल से आप बाहर आ सकते हैं, जब आप उस रास्ते का इस्तेमाल करेंगे तो हालात यह हो जायेंगे कि यह साहूकार व बाहुबली खुद आप से कहेंगे कि ऐसा कदम मत उठाओ और हमने आपका शोषण करके जो धन वसूल किया है, उसे सरकारी नियमों के अनुसार ही लेते हुये आपको इस कर्ज से मुक्त करेंगे।
पाठकों से अनुरोध है कि वे ऐसे शोषित किसानों व उन कर्जदारों को जो अपराध भाव की भावना से ग्रसित होकर एकाकी जीवन व्यतीत करके मानसिक तनाव में रहते हैं, व मन में खुदखुशी के विचार लाते हैं, उन्हें इस लेख के सार का महत्व समझायें व उनके मनोबल को मजबूत करवायें बस १० दिन और उनकी इस शोषित ज़िन्दगी को दूर करने का उपाय दिया जायेगा बस कुछ प्रतीक्षा करें और दिमाग से खुदखुशी करने के सारे विचार त्याग दें, मन में मान लें कि वह खुद अपराधी नहीं बल्कि इन भ्रष्टतंत्र की व्यवस्था को संभालने वाले वे अधिकारी व उनके दलाल अपराधी हैं।
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