एक तो नैनां कजरारे और तिस पर डूबे काजल में
बिजली की बढ़ जाए चमक कुछ और भी गहरे बादल में

आज ज़रा ललचायी नज़र से उसको बस क्या देख लिया
पग-पग उसके दिल की धड़कन उतर आई पायल में

प्यासे-प्यासे नैनां उसके जाने पगली चाहे क्या
तट पर जब भी जावे, सोचे, नदिया भर लूं छागल में

गोरी इस संसार में मुझको ऐसा तेरा रूप लगे
जैसे कोई दीप जला दे घोर अंधेर जंगल में

प्यार की यूं हर बूंद जला दी मैंने अपने सीने में
जैसे कोई जलती माचिस डाल दे पीकर बोतल में



2. कौन रोता है किसी और की खातिर..
       ........कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया

हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उनको
क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया

किस लिए जीते हैं हम किसके लिए जीते हैं
कई बार ऐसे सवालात पे रोना आया

कौन रोता है किसी और की खातिर ए दोस्त!
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया



3. हमसे भागा न करो, दूर गजलों की तरह
हमने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह

खुद-ब-खुद नींद-सी आंखों में घुली जाती है
महकी-महकी है शब-ए-गम तेरे बालों की तरह

तेरे बिन, रात ज्के हाथों पे ये तारों के अयाग
खूबसूरत हैं मगर जहर के प्यालों की तरह

और क्या उसमें जियादा कोई नर्मी बरतूं
दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह

गुनगुनाते हुए दर आ कभी उन सीनों में
तेरी खातिर जो महकते हैं सवालों की तरह

मुझसे नजरे तो मिलाओ कि हजारों चेहरे
मेरी आंखों में सुलगते हैं सवालों की तरह

जुस्तजू ने किसी मंजिल पे ठहरने न दिया
हम भटकते रहें आवारा ख्यालों की तरह

जिन्दगी! जिसको तेरा प्यार मिला वो जाने
हम तो नाकाम रहें, चाहने वालों की तरह।


4.कहते हैं कि सादगी के आगे क्या है
काजल की लकीर हो कि गाज़े का गुबार
खिलते हुए होंठ, मुस्कुराती आंखें
औरत का नहीं इससे हसीं कोई सिंगार

वो नार जिसे देश कहिए सौभाग
हर सांस तपस्या, नजर प्रेम का त्याग
जो आग के शोलों से गुज़र सकती है
जो मौत से अपना छीन सकती है सुहाग

कहते हैं कि तू गम को भी दे देती है रूप
घर तक नहीं महदूद तिरा रूप अनूप
जीवन की सुलगती हुई राहों में भी
तू जब साथ चले तो नर्म पड़ जाती है धूप

5.  ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का
संभल भ़ी जा कि अभी वक़्त है संभलने का

ये ठीक है कि सितारों पे घूम आये हम
मगर किसे है सलीक़ा ज़मीं पे चलने का

फिरै हैं रातों को आवारा हम, तो देखा है
गली-गली में समां चांद के निकलने का

हमें तो इतना पता है कि जब तलक हम हैं
रिवाज-ए-चाक गिरेबां नहीं बदलने का

5.  बस तीन ही चीजें हैं वतन का ज़ेवर
इस देश की सभ्यता का असली जौहर
इक फूल गुलाब, एक नदी गंगा
इक नार, जिसे बुलाएं गोरी कहकर

सीने पे पड़ा हुआ ये दोहरा आंचल
आंखों में ये लाज का लहकता काजल
तहज़ीब की ये तस्वीर, हया की देवी
पर सेज पे कितनी शोख, कितनी चंचल

हर सुबह को गुंचे में बदल जाती है
हर शाम को शमां बन के जल जाती है
और रात को जब बंद हो कमरे के किवाड़
छिटकी हुई चांदनी में ढल जाती है

तू खुद भी हसीं है मगर दुनिया में
ऐसा भी नहीं कोई हसीं और भी नहीं
पर इतना मुझे यकीं हैं मेरे घर में
जो तुझसे है रोशनी कहीं और नही

6.  गाती हुई हाथों में सिंगर की मशीन
कतरों से पसीने के शराबोर जबीन
मसरूफ किसी काम में देखूं जो तुझे
तू और भी मुझको नजर आती है हसीन

पानी कभी दे रही है फुलवारी में
कपड़े कभी रख रही है अलमारी में
तू कितनी घरेलू-सी नजर आती है
लिपटी हुई, हाथ की धुली साड़ी में

अब इसको किफायत कहो या इसका शऊर
औरत का तो ये गुण है सदा से मशहूर
हर तरह की तंगी भी उठा लेगी, मगर
चुपचाप से कुछ बचा के रखेगी जरूर

चुप रह के हर एक घर की परेशानी को
किस तरह न जाने तू उठा लेती है
फिर आए-गए से, मुस्कुरा कर मिलना
तू कैसे हर एक दर्द छुपा लेती है

7.  तू देश के महके हुए आंचल में पली
हर सोच है खुशबुओं के सांचे में ढली
हाथों को ये जोड़ने का दिलकश अंदाज
डाली पे कंवल की जिस तरह बंद कली


पैरों में चांदी की छनकती पायल
छल्लों के ये उंगलियों में बजते घुंघरू
हाथों में ये रह-रह के खनकते कंगन
लगता है कि सचमुच कोई संगीत है तू

ये तेरा स्वभाव, ये सलीका, ये सुरूप
लहजे की ये छांव, गर्म जज़्बों की ये धूप
सीता भी, शकुंतला भी, राधा भी तू ही
युग-युग से बदलती चली आए है तू रूप

8.  आहट-सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए, तो लगता है कि तुम हो

रास्ते के धुंधलके में किसी मोड़ पे,कुछ दूर
इक लौ-सी चमक जाए, तो लगता है कि तुम हो

सन्दल से महकती हुई पुरकैफ हवा का
झोंका कोई टकराए, तो लगता है कि तुम हो

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नदी कोई बल खाए, तो लगता है कि तुम हो

जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
चुपचाप से सो जाए, तो लगता है कि तुम हो

9.  तू देश के महके हुए आंचल में पली
हर सोच है खुशबुओं के सांचे में ढली
हाथों को ये जोड़ने का दिलकश अंदाज
डाली पे कंवल की जिस तरह बंद कली


पैरों में चांदी की छनकती पायल
छल्लों के ये उंगलियों में बजते घुंघरू
हाथों में ये रह-रह के खनकते कंगन
लगता है कि सचमुच कोई संगीत है तू

ये तेरा स्वभाव, ये सलीका, ये सुरूप
लहजे की ये छांव, गर्म जज़्बों की ये धूप
सीता भी, शकुंतला भी, राधा भी तू ही
युग-युग से बदलती चली आए है तू रूप

10.  तुम पे क्या बीत गई, कुछ तो बताओ यारो
मैं कोई गैर नहीं हूं कि छुपाओ यारो

इन अंधेरों से निकलने की कोई राह करो
खून-ए-दिल से कोई मशाल जलाओ यारो

एक भी ख्वाब न हो जिसमें वो आंखें क्या हैं
इक न एक ख्वाब तो आंखों में बसाओ यारो

बोझ दुनिया का उठाऊंगा अकेले कब तक
हो सके तुम से तो कुछ हाथ बटाओ यारो

जिंदगी यूं तो न बाहों में चली आएगी
गम-ए-दौरा के ज़रा नाज़ उठाओ यारो

उम्रभर कत्ल हुआ हूं मैं तुम्हारी खातिर
आखिरी वक्त तो सूली न चढ़ाओ यारो

और कुछ देर तुम्हें देख के जी लूं ठहरो
मेरी बगल से अभी उठ के न जाओ यारो।

11.  सौ चांद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
तुम आए तो इस रात की औकात बनेगी

उनसे यही कह आए कि अब हम न मिलेंगे
आखिर कोई तकरीब-ए-मुलाकात बनेगी

ये हमसे न होगा कि किसी एक को चाहें
ए इश्क! हमारी न तिरे सात बनेगी

हैरतकदा-ए-हुस्न कहां है अभी दुनिया
कुछ और निखर ले तो, तिलिस्मात बनेगी

ये क्या है कि बढ़ते चलो, बढ़ते चलो आगे
जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी।

by..Aarti jain....................................