Divya Mandle posted: "कहीं खो सी गई है हंसी कभी खेतों में लहलहाती सी दिखती थी कभी पनघट पर छल-छलाती सी चूल्हे में नर्म रोटी सी दिखती थी हंसी चौपालों पर, गलियों में आसानी से मिलती थी हंसी अब हंसी सिमट गई है आलीशान दीवारों तक मल्टीप्लेक्स में लोग हंसी खरीदने जाते हैं दम घुटने लगा"
|
Subscribe to:
Comments (Atom)





