
कुछ न भाये,बिन तुम्हारे
अब तो जीवन में
लो शरण में,दो दरस अब
यही चाह जीवन में ।
मन बना,मंदिर है जबसे
सूरत तेरी ही बसी
दिन-रात नवाऊं शीश अपना
चाहूँ, तुझको जीवन में ।
हर दिन पिरोऊँ पुष्प माला
अपनी चाहत की
इक रोज़ पहने,तू स्वयं आकर
यही ख़्वाब जीवन में ।
खुद न कहीं मै, बस तू है
मेरी साँसों में जो चलता
इक बार आकर छू ले मुझको
जी-जाऊँ जीवन मैं ।.
***दिव्या मंडले***
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