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कोशिश है कि माँ के लिए अपने दिल के जज़बात परोस सकूं जबकि यह मालूम है चाहे कितना ही कहूँ कम ही होगा। शुरुआत कहाँ से करें ये भी समझ नहीं आ रहा,पर हाँ इतना अवश्य मालूम है कि माँ में ही दुनिया है इसके अतिरिक्त और कहीं नही। जब हम छोटे थे तब माँ का सारा स्नेह सिर्फ माँ की एक जिम्मेदारी लगता था उसके भाव तो अब समझ आते हैं। सुबह की प्यार भरी'चूम'के साथ माँ का प्यार,नाश्ते में बनी पसंद की चीज़ों में माँ का प्यार,भले-बुरे की डाँट में माँ का प्यार,जीने का सलीका सिखाता माँ का प्यार,अपने हर गम को छुपाता माँ का प्यार,अपनी हर पसंद को दबाता,अपनी तकलीफ खुद ही सहता माँ का प्यार,गर्म दिनों में आँचल से हवा करता माँ का प्यार,सर्द रातों में यूँ खुद से चिपकाती माँ का प्यार,हर मंदिर में दुआ करती माँ का प्यार,सुबह चुपके से उठकर रसोंई बनाती माँ का प्यार,हलवा खाने की चाह पर उसे परोसती माँ का प्यार,कमज़ोर शरीर से भी ताकत दिखाती माँ का प्यार,बच्चों के दूर जाने का दर्द सहती,उनके लिए लड्डू,मठरी बनाती नम आँखों से दुआएं देती माँ का प्यार,हर तरक्की पर दौड़ मंदिर में घंटा बजाती माँ का प्यार,पापा की डाँट से बचाती,हमारे लिए खुद ही लड़ जाती माँ का प्यार,हर एक फोन के अंत में"खुश रहो बेटा"
कहती माँ का प्यार,अपनी हर पसंद की चीज़ को यूँ ही न्यौछावर करती माँ का प्यार,अपने जीवन की हर साँस से सिर्फ हमारे लिए खुशी माँगती माँ का प्यार,लिखतें चलें तो अन्त नहीं,अनन्त है माँ का प्यार।
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