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साक्षर हूँ नौजवान हूँ
घरों से कूड़ा  उठाता हूँ
पुश्तैनी काम है….
बाप-दादा निरक्षर थे
रोटी के वास्ते इसी पे निर्भर थे
मुझे ! साक्षर बनाया
माँ की आँखों ने सपना पहनाया
मगर फिर भी…
न बदला कुछ
साक्षरता ने कैसा अभियान चलाया ।
रोटी के लिए,कितनो को खटकाया
जब ,न जुटा पाया रोटी दो वक्त की
न बाप की लाठी , न दवा माँ की
फिर , मैंने हांथों में टोकरा उठाया ।
बस ! इतना न समझ पाया ,क्यूँ
माँ ने था मुझे सपना पहनाया
कोई काम छोटा या बड़ा नहीं
ये तो – माँ ने समझाया
फिर किस वास्ते मुझे साक्षर बनाया ।