रजनीगंधा ही पसंद है वही न कोई लाया
ग़ुलाब की फुलवारियों ने कभी न रिझाया ।
हाँ ! अलग है रजनीगंधा से प्यार होना
कशिश ने उसकी,जब तक न बहकाया ।
मासूमियत पे उसकी बस बिछ ही जाते
कली की ख़ुशबू ने अरमानों को जगाया ।
फैला सुगंध अपनी मधु तरंग वो छोड़ती
है बार-बार उसने तन-मन को महकाया ।
ले आना इस बार संग रजनीगंधा का सुरूर
इक उसी ने घुल साँसों,में रूह को महकाया ।
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