
शनिवार की सुबह साढ़े नौ बज गये हैं और सुबह की पहली चाय का सुख हमें अब मिल रहा है।प्रत्येक शनिवार यही होता है कबीर के स्कूल की छुट्टी के कारण हम सुबह जल्दी नहीं उठ पाते हैं,और जब उठते हैं तो सूरज के ऑफिस जाने की ऐसी भागमभाग मचती है कि किसी तरह उनका लंच पैक करके नाश्ता करवा पाती हूँ.इसी वजह से सूरज के ऑफिस निकलने के बाद ही प्रथम चाय का सुख मिलता है।घर अभी पूरी तरह फैला है चाय पीने के बाद ही समेटेंगे। कबीर आज का अखबार देना बेटा,देखो कहाँ है मुझे मिल नहीं रहा। क्या मम्मा आप भूल गईं डैडी हमेशा ही पेपर बाथरूम में छोड़ देते हैं।
टिंग-टांग,टिंग-टांग…कबीर प्लीज़ देख लो कौन है मैं चाय तो शांति से पी लूं। हैलो आंटी,हैलो बेटा. ये तो मेरी दोस्त कविता की आवाज़ है। कमरे में आते ही कविता फ़फ़क-फ़फ़क कर रो पड़ी। कबीर भाग कर पानी ले आया और बिना कुछ पूछे ही वहाँ से अपने कमरे में चला गया। कविता पानी पी लो,थोड़ा शांत हो जाओ फिर बताओ कि बात क्या है? और तब कविता ने बयाँ किया अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सच…
सेवा या तो मैं स्वयं को खत्म कर लूंगी या फिर प्रतीक को.बहुत हो चुका अब मैं और नहीं झेल सकती रोज़-रोज़ की चिकचिक। शादी के पूरे पंद्रह वर्ष बीत गये इसी तरह पर अब और नहीं। अपना आत्मसम्मान खोकर मैं नहीं जीना चाहती क्या प्यार की यही परिभाषा है जब प्यार पत्नी रूप में मिले तो उसे किसी जंक लगे सामान की तरह समझा जाए।
सेवा मैनें प्रेम विवाह किया था मैं और प्रतीक एक साथ ही विश्व-विद्यालय में पढ़ते थे हालांकि प्रतीक मेरे सीनियर थे और पढ़ाई में अव्वल और मैं एक खूबसूरत सी अल्हड़ लड़की जिस पर हर कोई मर मिटता था।मेरा बबली नेचर ही मेरी पहचान था और सब इसी की वजह से ही मुझे प्यार करते थे शायद यही वजह रही होगी कि प्रतीक का दिल मुझ पर आ गया और उन्होंने मुझसे अपने प्यार का इज़हार भी कर डाला। हालांकि यह मेरे लिए पहला प्रस्ताव नहीं था इससे पहले भी कई लड़को से मुझे ऐसे प्रस्ताव मिल चुके थे। प्रतीक मे कुछ तो था हालांकि वो सामान्य कद-काठी का सामान्य चेहरा ही था फिर भी न जाने कैसे उसने मेरे दिल को छू लिया और मैं उसके विराट प्रेम के समक्ष कब उसके अधीन होती चली गई मुझे खुद ही नहीं पता। घर में माँ-पापा को ये रिश्ता कुछ ठीक नहीं लगता था पर मैंने इसकी परवाह ही नहीं की। प्रेम कब इन बंधनों को मानता है वो तो बस प्रेम ही जानता है…
घर से भाग कर हम दोनो ने शादी कर ली इससे पहले कि समाज हमारे रिश्ते को जातिवाद या अन्य प्रथाओं से तौले हम एक हो गए। हालांकि ये शादी सिर्फ दोस्तों की शुभकामनाओं से हुई पर बाद में हमने माँ-पापा सब
को मना लिया। इतनी मुश्किलों से जुड़े इस रिश्ते से आज मुझे सिर्फ घुटन होती है
क्योंकि वो प्यार जिसके लिए मैने सारी सीमाएँ लाँघी वो प्यार था भी आज तो मुझे इस पर भी शक है। प्रतीक
को पाकर मैंने सब कुछ भुला दिया लेकन प्रतीक तो मुझे कभी मिला ही नहीं। शादी की पहली रात जब दो अजनबी मिलते हैं तो उनके बीच एक रिश्ते की शुरुआत होती है जिसमें प्यार,विश्वास,समर्पण,तयाग न जाने क्या-क्या बेशुमार भरा होता है और जब दो प्यार कने वाले शादी की पहली रात मिलते हैं तो,मेरे लिए उसका व्याख्यान बिलकुल अलग है-सारी कल्पनाओं से अलग। शादी के बाद एक दोस्त के घर पर हमारी पहली रात थी क्योंकि हम दोनो के ही परिवार इस शादी से नाराज़ थे,उन्हें ये रिश्ता स्वीकार न था। मिलन की प्रथम रात्रि
सोच कर ही मन मे अजब सी हलचल हो रही थी। एक सामान्य सा कमरा आज हमें किसी जन्नत समान लग रहा था। प्रतीक मुझे प्यार से उस कमरे में छोड़ कर चले गये कि तुम आराम करो मै बस अभी आया। और
मैं अपनी भावनाओं को समेटे प्रतीक के असीम प्यार के मीठे सपने बुनने लगी। काफी रात हो गई प्रतीक का
कुछ पता नहीं,कहाँ है? कब आएगा..मैं रोने लगी और मेरे आँसू पोछने के लिए वहाँ कोई न था रात गुज़र गई इंतजार करते,कब आँख लग गई कुछ ख़बर नहीं हाँ सुबह जब आँख खुली तब प्रतीक मेरे सामने था
सॉरी कविता रात में दोस्तों के साथ टीवी पर मैच देखने में समय का पता ही न चला और जब मैं कमरे में आया तुम सो चुकी थी। खैर चलो अब हमारे लिये चाय बना दो सुबह की चाय तो तुम पिलाओगी न…
सेवा,क्या प्यार ऐसा होता है जिसे आप इतनी शिद्दत से चाहो जब वो मिल जाए तो आपको उसकी भावनाओं का ज़रा भी ख़याल न आए। मेरे सारे सपने दिन ब दिन इसी तरह धराशायी होते चले गये। शादी के बाद के एक दो साल की जो यादे आपके जीवन में खुशियाँ भर देती हैं वो मेरे पास सिर्फ एक दर्द के रूप मे हैं। प्रतीक अपने दस्तों में ऐसे मस्त रहते कि मैं भी वहाँ हूँ इसका उन्हें अहसास भी न था।
शादी के बाद मेरी पढ़ाई भी छूट गई प्रतीक ने मुझे मेरा एम.ए. भी नहीं पूरा करने दिया। दो साल बाद मुझे माँ बनने का सुख ज़रूर दिया लेकिन मुझे एक फर्नीचर मात्र बना दिया। मैंने बेटी रितु को जन्म दिया तब प्रतीक को पिता
बनने की खुशी अवश्य हुई मेरे लिए तो यही बहुत था कि कम से कम वो रितु से बहुत प्यार करते हैं और मैं यही देख कर संतुष्ट हो जाती। लेकिन हमारे बीच तो दूरियाँ बढ़ती ही गई मेरे अंदर की दबी कड़वाहट भी अब बाहर आने लगी थी। प्रतीक मुझे हर बात पर नीचा दिखाते कभी कहते तुम मरे लायक ही नहीं हो,मैने नौकरी करनी चाही तो वो भी नहीं करने दी । प्रतीक से मैंने निश्छल प्यार किया लेकिन प्रतीक ने कभी मुझसे प्यार किया भी था आज मेरे पास इन सवालों के कोई जवाब नहीं। ऐसा लगता है कि जवानी के जोश में किसी शर्त के तहत उन्होंने मुझे अपने प्रेम जाल में फाँसा व छला है। मैं मात्र एक सामान नहीं हूँ जिसे जब चाहा जैसे इस्तेमाल किया और फिर उसकी तरफ देखा भी नहीं,अब मेरे सब्र की सीमा पार हो चुकी है इन्ही हालातों की वजह से मजबूरन मैंने नौकरी कर ली है और आज मैं अपने इस निर्णय से बहुत खुश हूँ क्योंकि आज मैं आत्म निर्भर हूँ और इसी वजह से इतना बड़ा कदम उठाने का साहस कर पा रही हूँ कि हम साथ नहीं रह सकते। साथ रहने की वजह सिर्फ रितु है लेकिन हमारे झगड़ो से उसका विकास भी प्रभावित हो रहा है आज सुबह तो प्रतीक ने रितु के सामने ही मेरे चरित्र को भी तार-तार कर दिया,तुम्ही बताओ उस छोटी सी बच्ची से मैं कैसे नज़रें मिलाऊँ। हर दिन अपने आत्म सम्मान की अर्थी उठाती जाऊँ! नहीं सेवा, मैंने फैसला कर लिया है मैं अपना एक अलग आशियाँ बनाऊँगी जहाँ अपनी बेटी के साथ रहूँगी और प्रतीक को पुनः ये अवसर कभी नहीं दूंगी
कि वो मेरी बेइज्ज़ती कर सके यह मेरा द्रढ़ निश्चय है।
प्यार सिर्फ़ प्यार होता है,प्यार एक खूबसूरत अहसास है कोई अभिशाप नहीं इसलिए ऐसा नहीं कि प्यार नहीं करना चाहिए परन्तु ये अवश्य जान लेना चाहिए कि उस प्यार की सच्चाई क्या है। जीवन के कठिन उतार-चढ़ावों मे आपका प्यार आपकी ताकत बनेगा या कि आपको खोखला ही कर देगा…
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