
माना की बहुत सख्त बहुत तेज़ हूँ मैं
बढ़ते हुए जीवन का आवेग हूँ मैं।
जब ढूंढ़ते सब सुबह-शाम को सदा
उस वक्त के बीच का गर्म जोश हूँ मैं।
जीवन है जटिल न छाँव मिलती है सदा
हर जटिलता को यहाँ परिभाषित करती हूँ मैं।
आ के मुझसे मिल गर जीना है जीवन को
मृगतृष्णा न दिखाती बस,प्यास बुझाती हूँ मैं।
जानती हूँ हर कोई चाहे,रहना मुझसे दूर
निभाती हूँ साथ फिर भी,न कभी घबराती मैं।
दोपहर हूँ मैं…….
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