Delhi 2010: XIX Commonwealth Games दिल्ली २०१०...

Delhi 2010: XIX

सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो…..सचमुच प्यार को किसी नाम या फिर शब्द में बांध पाना मुश्किल ही नहीं असंभव है. कई दिनों से सोच रही थी कि प्यार पर कुछ प्रैक्टिकल बातें कहूं, लेकिन जब भी कुछ लिखती हूं ऐसा लगता है कि लाइनें नहीं मिल रही हैं और शब्द खो से गए हैं. प्यार को समझने और उसे करीब से महसूस करने के दावे करना आसान है, लेकिन अक्सर सागर के छिछले स्तर को ही हम गहराई समझ लिया करते हैं. समय के साथ प्रेम बदल रहा है प्रेम अब केवल समर्पण ही नहीं चाहता बल्कि वह प्रदर्शन का भी भूखा है. जैसे अगर आपने वैलेंटाइन डे पर गिफ्ट नहीं दिया, रोज डे पर रोज नहीं दिया तो इसका सीधा सा मतलब है कि प्रेम के इस प्रैक्टिकल गेम में आप एकदम फिसड्डी हैं. प्यार का यह बाजार हमने ही तैयार किया है. यहां हम कस्टमर भी खुद हैं और प्रोडक्ट भी खुद…..अब प्रेम में पडऩे के लिए लड़के जहां लड़की को 36-24-36 के पैरामीटर्स पर खरा उतरना देखना चाहते हैं तो वहीं लड़कियां चाहती हैं कि किसी छिछोरे के प्यार में पडऩे की बजाय वह किसी एजुकेटेड वेल सेटल्ड लड़के को फंसा लें….ताकि लाइफ के मजे भी हों और फ्रैंड सर्किल में इज्जत भी बनी रहे. कुछ महिने पहले मैं अपनी फैमिली के साथ दिल्ली के पुराना किला में घूमने गई थी. दस रुपए टिकट किला घूमने का था और दस रुपए म्यूजियम देखने के भी…..हिस्टोरिकल प्लेसेज में मेरी रूचि रही है सो मेरी जिद के कारण फैमिली को साथ में चलना पड़ा. किला बहुत बड़ा था और ज्यों-ज्यों हम एक-एक सीढ़ी चढ़ते कोई न कोई जोड़ा हमें दीवार की ओट में दिख जाता. हालांकि हम इन जोड़ों के 'आराम' में खलल डालने नहीं गए थे, लेकिन जो कुछ भी सामने था उसने हम सभी को आंखें नीची करने पर मजबूर कर दिया. चोरी-छुपे नैन मट्क्का करने में जहां कुछ उम्र दराज जोड़े शामिल थे तो वहीं स्कूली बच्चे भी. दिल्ली दर्शन का यह मेरे लिए पहला मौका था और हम जिधर भी जा रहे थे वहीं इस तरह के सीन आम थे. मेरे और फैमिली के लिए यह बहुत इंबैरेसिंग सिचुएशन थी. सोलह साल का लड़का जो कि कुछ इस तरह डे्रस्डअप था कि वह कुछ बड़ा. उसकी गर्लफ्रैंड 14 साल की लड़की जो फेस पर ढेर सारा पाउडर लगाकर अपने गहरे रंग को छिपाने की कोशिश करने के साथ ही होंठों को गहरी लिपिस्टिक से पोतकर आई थी. लड़के के चेहरे पर डर की बजाय छिछोरापन दिख रहा था तो वहीं लड़की कुछ डरी होने के बावजूद अपने साथी के सीने में चेहरा छिपाने की कोशिश करती दिखाई दी. इनके लिए यही प्यार है. बाद में पता चला कि दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों में यह सब होना आम है. पार्कों में भी इस तरह के लव मेकिंग सीन देखने को मिल जाते हैं. प्यार के नाम पर बंद कमरों की कहानियां कुछ इसी तरह प्रदर्शित हो रही हैं. यह भी प्यार के बाजार का ही एक हिस्सा है. बाजार हमें सिखा रहा है कि हमें कैसे प्यार करना है, कौन से दिन प्रपोज करना है और क्या गिफ्ट देना है. यहां पर आपको प्यार में जीने-मरने की गारंटी लेने की जरूरत नहीं है. प्रेमी-प्रेमिका प्रोडक्ट की तरह सामने हैं. डेटिंग साइट पर जाइये और अपने लिए एक पार्टनर सेलेक्ट कर लिजीए हां बाजार के मापदंडों को समझ गए तो टिकाऊ पार्टनर मिल जाएगा नहीं समझे तो इस लव गेम में फिसड्डी साबित हो जाएंगे.

DIVYA -MANDLE-:आपकी दोस्त दिव्या मंडले :-DIVYA -MANDLE