कहते हैं कि सादगी के आगे क्या है
काजल की लकीर हो कि गाज़े का गुबार
खिलते हुए होंठ, मुस्कुराती आंखें
औरत का नहीं इससे हसीं कोई सिंगार
वो नार जिसे देश कहिए सौभाग
हर सांस तपस्या, नजर प्रेम का त्याग
जो आग के शोलों से गुज़र सकती है
जो मौत से अपना छीन सकती है सुहाग
कहते हैं कि तू गम को भी दे देती है रूप
घर तक नहीं महदूद तिरा रूप अनूप
जीवन की सुलगती हुई राहों में भी
तू जब साथ चले तो नर्म पड़ जाती है धूप
काजल की लकीर हो कि गाज़े का गुबार
खिलते हुए होंठ, मुस्कुराती आंखें
औरत का नहीं इससे हसीं कोई सिंगार
वो नार जिसे देश कहिए सौभाग
हर सांस तपस्या, नजर प्रेम का त्याग
जो आग के शोलों से गुज़र सकती है
जो मौत से अपना छीन सकती है सुहाग
कहते हैं कि तू गम को भी दे देती है रूप
घर तक नहीं महदूद तिरा रूप अनूप
जीवन की सुलगती हुई राहों में भी
तू जब साथ चले तो नर्म पड़ जाती है धूप







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