दर्द की नीव
दर्द की आधार शिला पर,
आंसुओ की भीगी माटी से,
जोड़ गम के पत्थरों को,
सुखों का मंदिर बनता है,
जीवन में आसां कुछ नहीं,
वो सबके साथ खेलता है|
ले लोभ लालसा की ललक,
प्राय: पतित प्रोयोजन पर,
वो मंदिर तोड़ दिया जाता है,
और नव निर्माण में फिर से,
वही दर्द,वही गम ज़िन्दगी में
अवतरित हो जाता है,
लांछन किसी पर लगा,
दोष मढ़ किसी पर ,
खुद को दोषमुक्त समझ,
दुनियां से हर कोई खफा होता है ,
दूध के धुले है सब,
बुरा होने को बस खुदा बच जाता है|
कोई दुष्ट,कोई मतलबी,
कोई बुरा बन जाता है,
अपने दुखो की गठरी,
किसी और को दे ,
बढती राहों में तनहा
सुख भोगना चाहता है,
आसाँ राहों की खातिर सच्चा कर्तव्य,
ताक़ पर रख दिया जाता है|
कोई नहीं समझता की सुखो का मंदिर
दर्द की नीव पर ही बनता है
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