मैं अब दिन-रात उसकी यादों से गुजरता हूँ,
दुआयें रोज़ मांग कर भी, ग़मों से आह भरता हूँ
सजा है या मज़ा है ये, बता मुझको मेरे मौला,
ये कैसा हाल है मेरा, न जीता हूँ, ना मरता हूँ
तड़पता हूँ और रोता हूँ तन्हाई में जिसे याद कर करके,
कैसे कह दूँ मैं उसे, कि कितना प्यार करता हूँ
कैसे मांगूं उसे, कि उसे भी मोहब्बत है किसी से,
इलाही देखिये अब तो, मै उसकी आहट से डरता हूँ
उसे मुबारक हो ये शमा, ये जश्न ख़ुशी के,
मैं तो परवाना हूँ, दर्द में हर-एक शाम जलता हूँ
न हंशी है, ना ख़ुशी है, न है रंग, ना सपने,
उसके बिन क्या कहूँ, कि किस हाल रहता हूँ
गर ये प्यार है तो, ना हो और किसी को
ये दुआ अब तो मै, हरदम हर-रोज़ करता हूँ
ये कैसा हाल है मेरा, न जीता हूँ, ना मरता हूँ
ये कैसा हाल है मेरा, न जीता हूँ, ना मरता हूँ
अंकित बंजारे जबलपुर
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