बाती….
रात भर जल चुकी मैं, अब न कुछ शेष
फिर जलाने के लिए कुछ नया खोजिये ।
दौर है ये आंधियो का,देखो ज़रा ध्यान से
जलूं रात-दिन मैं दिया और गहरा कीजिये।
तेज़ धूप और जलन, फैली है चारों ओर
गहराई के साथ थोड़ी नमी और दीजिये ।
उलझनों की पूँछ है, बढ़ रही हर दिन तेज़
जलूँगी मै रात-दिन भरोसा थोड़ा लम्बा कीजिये।
जल रही हूँ सदियों से, है यही मेरा काम
फिर अंधेरों में फँस न निराश हमे कीजिये ।
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