कहीं खो सी गई है हंसी
कभी खेतों में लहलहाती सी दिखती थी
कभी पनघट पर छल-छलाती सी
चूल्हे में नर्म रोटी सी दिखती थी हंसी
चौपालों पर, गलियों में
आसानी से मिलती थी हंसी
अब हंसी सिमट गई है
आलीशान दीवारों तक
मल्टीप्लेक्स में लोग
हंसी खरीदने जाते हैं
दम घुटने लगा है ठहाकों का
हंसी की चमक चेहरे पर नहीं
चमचमाती कारों और
उनकी कतारों में दिखती है
हंसी कैद हो गई है
मैले-कुचैले चीकट कपड़े पहने
सर्दी में नंगे पांव कूड़ा बीनते
बच्चों के टाट के थैले में….
आरती जोशी द्वारा अभनपुर
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