छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ इलाके की घोटुल-संस्कृति में बहुत बदलाव आया है। जहां कभी घोटुल में शाम होते ही गांव के अविवाहित युवक-युवतियां एकत्र होने लगते थे, मान्दर की थाप दूर-दूर तक सुनाई देने लगती थी, युवक-युवतियां परस्पर हास्य-विनोद करते, पहेलियां बुझाते, कहानी-किस्से कहते तथा नृत्य-गीतों में डूब जाते थे, वहां अब स्कूल लगने के साथ ही कई रचनात्मक कार्य होने लगे हैं।
घोटुल में समय के साथ आता बदलाव
आज भी दुनिया में घोटुल कौतूहल का विषय है लेकिन लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आता जा रहा है। कम ही सही, युवा वर्ग शिक्षित हो गया है इसलिए वह घोटुल नाच-गाने में ही अपना समय न बिताकर रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ रहा है। अब अधिकतर घोटुलों में आंगनबाड़ी केन्द्र चलने लगे हैं जहां छोटे बच्चों को शिक्षा के साथ पोषक आहार दिया जा रहा है। इसी तरह गर्भवती महिलाओं को भी पोषक आहार के प्रति जागरूक किया जाता है। घोटुलों में अब बड़े-बुजुर्ग बैठकें करने लगे हैं जहां गांव के विकास पर चर्चाएं हुआ करती हैं और निर्णय लिए जाते हैं। यहां संकुल केन्द्र भी चल रहे हैं। गांव में यदि कोई कार्यक्रम होता है अथवा शासकीय कर्मचारी आते हैं तो उन्हें घोटुल में ही ठहराया जाता है। भोजन की व्यवस्था भी इसी स्थान पर की जाती है।
ना समझों ने किया दुष्प्रचार
आदिवासी संस्कृति से अनभिज्ञ लोगों ने घोटुल संस्कृति का दुष्प्रचार किया। सालों पहले बीबीसी ने यहां के मनोरंजन की वीडियो तैयार कर उसे गलत रूप में प्रसारित किया था। घोटुल संस्कृति का दुष्प्रचार न हो, इसके लिए बाहरी लोगों का अबूझमाड़ में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया था। तकरीबन डेढ़ साल पहले मुख्यमन्त्री डॉ. रमन सिंह ने प्रतिबंध हटा दिया है। शिक्षा के प्रसार से युवाओं का रुझान घोटुल के प्रति कम हुआ है, जिससे घोटुल कई स्थानों पर लगभग बन्द होने के कगार पर है। अनपढ़ और कम पढ़े-लिखे युवाओं का भी घोटुल के प्रति आकर्षण कम हुआ है। वे घनघोर जंगल से निकलकर शहरी चमक-दमक से प्रभावित हो रहे हैं और रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर रुख भी कर रहे हैं।
बाहरी संस्कृति का प्रभाव
इस इलाके के गांवों में जाकर अध्ययन करने से ज्ञात हुआ कि घोटुल पर बाहरी संस्कृति का प्रभाव पड़ने लगा है। यहां के ग्रामीण मजदूरी करने गांव के बाहर कस्बों, तहसीलों एवं अन्य बड़े शहरों में जाने लगे हैं जहां पर वे गैर आदिवासी संस्कृति के संपर्क में आए हैं और उन्हें इसका आकर्षण अपनी ओर खींचने लगा है। आधुनिक सभ्यता से हुए संपर्क के बाद मुरिया समाज में घोटुलों के प्रति हीनभावना पैदा होने लगी है। मौजूदा परिस्थितियों में यह माना जाता है कि नारायणपुर जिले में नक्सली वर्ष 1985-86 के आस-पास आए। तब से वे लगातार अबूझमाड़ क्षेत्र में अपनी पैठ जमाकर अपनी संख्या में लगातार इजाफा कर रहे हैं। इनके द्वारा आदिवासियों की प्राचीन संस्कृति खत्म करने की चाल चली जा रही है। इससे घोटुल की प्रथा पर गहरा असर पड़ रहा है।
माओवाद ने भी उत्पन्न किया संकट
नारायणपुर आज अत्यन्त संवेदनशील नक्सलीगढ़ माना जाता है। अबूझमाड़ की भौगोलिक स्थिति, जिसमें से बड़े-बड़े विशाल पहाड़, नदी-नाले, घने वन हैं जो नक्सलियों के लिए स्वर्ग से कम नहीं हैं। ऐसी स्थिति का फायदा उठाते हुए माओवादियों ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। घोटुल के बन्द होने के संबध में कुछ ग्रामीणों से चर्चा करने पर यह बात सामने आई कि माओवादी संगठन आदिवासियों के रक्षक नहीं बल्कि भक्षक हैं जो वास्तव में आदिवासियों का विकास नहीं चाहते। दूसरी ओर, इस क्षेत्र में माओवादियों व नक्सलियों को खदेड़ने के लिए शासन स्तर से अनेक दूरस्थ अंचलों में पुलिस बेस कैंप स्थापित किए हैं जो रात्रि में गश्त करते हुए गांवों में पहुंचते हैं। ऐसे में घोटुल के नवयुवक-युवतियां पुलिस सन्देह के दायरे में आ जाते हैं। इस वजह से घोटुल की प्रथा पर असर पड़ा हैं।
पुराने घोटुल का स्वरूप
नारायणपुर जिले के घोटुल संगठन में प्रवेश गतिविधियां, नियम, कार्य आदि में समानताएं हैं, फिर भी यह कहा जाता है कि अबूझमाड़ क्षेत्र के घोटुल आज कुछ हद तक जीवित हैं जबकि नारायणपुर तहसील के आस-पास के घोटुलों की स्थितियों में अन्तर दिखलाई पड़ता है। वैसे तो घोटुल गांव की संपत्ति माने जाते हैं। गांव के बच्चे, जवान व बूढ़े तन्मयता से श्रमदान करके घोटुल भवन (झोपड़ी) का निर्माण करते हैं। घोटुल ही गांव का एक ऐसा सार्वजनिक व इकलौता स्थान है जहां पर गांव की प्रमुख बैठकें आयोजित की जाती हैं। गांव में त्योहार, उत्सव या शोक की स्थिति अथवा गांव की समस्याओं का समाधान पर चर्चा के लिए घोटुल को ही उपयुक्त माना जाता है।
मनोरंजन से यौन शिक्षा तक मिलता था घोटुल में
घोटुल को मुरिया समाज की आधारशिला भी कहा जाता है। इस संस्था की उत्पत्ति लिंगोदेव से मानी जाती है। संध्या होते ही गांव के अविवाहित युवक-युवतियां घोटुल में एकत्र होकर नृत्य व हास्य-विनोद करते हैं और पहेलियां बुझाते हैं। ये अपनी संस्कृति से तो परिचित होते ही हैं, साथ ही अनेक गुप्त बातों का ज्ञान एवं यौन शिक्षा के लिए भी अवसर प्राप्त करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि नारायणपुर जिले के अबूझमाड़िया, मुरिया, गोण्ड जनजातियों में गांव के अविवाहित युवक-युवतियां एक ही घर में रात बिताते थे। यहां वे अपनी इच्छानुसार साथी चुन लेते थे। ये साथी कभी-कभी या नियमित रूप से बदल लिए जाते थे और यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक वे विवाह करके इस संस्था को छोड़ नहीं देते थे। कभी-कभी जीवन भर के लिए साथी चुन लिया जाता था जो विवाह के रूप में परिणत हो जाता था।
युवक-युवतियों के काम बंटे होते थे
घोटुल में युवक और युवतियों के कार्य बंटे हुए हैं। चेलिक (युवक) जंगल से लकड़ी काटकर लाते हैं, शिकार करते हैं तथा खेतों में काम करते हैं, जबकि मोटियारिन (युवती) घोटुल में झा़ड़ू लगाने एवं गोबर से लीपने का कार्य करती हैं, वे पत्ते इकट्ठा कर दोना पत्तल बनाती हैं, पानी लाना एवं आग जलाने का कार्य भी करती हैं। घोटुल का हर सदस्य नियमित रूप से अपना कार्य करता है और नियमों का कड़ाई से पालन करता है। रात का भोजन करने के बाद लड़कियां घोटुल में प्रवेश करतीं और लड़कों के साथ हास्य-विनोद एवं नृत्य-गीतों से मनोरंजन करती हैं। घोटुल में मोटयारिनों के नाम अलग रखे जाते हैं और उन्हें माता-पिता द्वारा रखे गए नामों से नहीं पुकारा जाता है। दुलसो, जनको, मलको, जलरी, सालो, झल्लारी, झनको आदि नाम घोटुल द्वारा सदस्यों को दिए जाते हैं। इसी प्रकार चेलिकों के भी घोटुल में नाम सिलेदार, सैदार, जलीसांय, मेलया, सालिगराम, बैलूनदार, लहरू, लहरदार, कोमवार, कपटवार आदि होते हैं।
विवाह तय होने का भी स्थान घोटुल
घोटुल में चोली नृत्य भी होता रहा है जिसे केवल मोटयारिनें ही करती थीं। मरमिंग नृत्य विवाह के समय किया जाता है। पस कोलांग नृत्य डण्डे के साथ किया जाता है और यह सप्तमी-अष्टमी से प्रारंभ होता है। रात को चेलिक तथा मोटियारिन गीतों में सवाल-जवाब करते हैं। ये गीत उनके जीवन से सम्बंधित होते हैं। जब किसी मोटयारिन का विवाह तय हो जाता है, उस समय मोटियारिन साथी चेलिकों, मोटयारिनों के पास बैठती है और उन्हें शराब भेंट करती है। घोटुल से मोटियारिन की बिदाई बड़ी ही मार्मिक होती है। कौमार्य जीवन की उन्मुक्तता विवाह के सूत्र में बंध जाती है तथा चेलिक व अन्य मोटियारिनें उसके सुखी जीवन के लिए शुभकामनाएं देते हैं।
अबूझमाड़ में सिर चढ़कर बोलता है रेडियो का जादू
दुनिया भले ही मोबाइल और इंटरनेट के युग में पहुंच गई है लेकिन देश-दुनिया से कटे अबूझमाड़ में तो अब भी रेडियो की आवाज ही गूंजती है। यहां खबर और मनोरंजन का इकलौता जरिया आज भी रेडियो ही है। अबूझमाड़ के बाहर भले ही डीटीएच, एलसीडी और प्लाज्मा टीवी समृद्धि के प्रतीक हों लेकिन यहां तो वही समृद्ध है जिसके पास रेडियो है। रेडियो अबूझमाड़ का अकेलापन ही नहीं तोड़ता, वह दूसरी दुनिया से संपर्क का माध्यम भी बनता है।
अबूझमाड़ और इसकी सरहद पर बसे गांवों में माओवादियों की हलचल के कारण न तो यहां बिजली पहुंच पाई है और न ही सड़कें। ऐसे में रेडियो ही दुनिया को जानने का माध्यम है। इन इलाके में गोण्डी और हल्बी के अलावा आंशिक तौर पर छत्तीसगढ़ी भी बोली जाती है। अबूझमाड़ में जगदलपुर और रायपुर आकाशवाणी के कार्यक्रम सुने जाते हैं। ये हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में होते हैं। कुछ कार्यक्रम हल्बी और गोण्डी में भी होते हैं। इनके जरिए अबूझमाड़ियों को देश-दुनिया की खबर मिलती है। रेडियो के चलते माड़िया लोग आंशिक तौर पर हिन्दी समझने-बोलने लग गए हैं।
हिंदी भी जोड़ती है दुनिया से
हिन्दी का आंशिक ज्ञान इन्हें दुनिया में होने वाले घटनाचक्र से रू-ब-रू कराता है। जगदलपुर और रायपुर के आकाशवाणी केन्द्रों से गोण्डी गीत सोमवार की सुबह आठ बजे से प्रसारित होते हैं। इसे वे बड़ी दिलचस्पी से सुनते हैं। अबूझमाड़ की प्रमुख बस्ती- ओरछा से सटे गांवों की युवा पीढ़ी रेडियो का उपयोग खासतौर पर क्रिकेट कामेंटरी सुनने के लिए करती है। ओरछा के आस-पास के गांवों में कुछ जागरूकता आई है, यह इसका प्रमाण है। इरक गांव के सन्तूराम कुमेटी का कहना है कि खेती से जुड़ी जानकारियां हिन्दी में होती हैं।
हिन्दी की बेहतर समझ नहीं होने के चलते इसका फायदा नहीं मिलता। खेती और सेहत से जुड़ी जानकारियां अगर गोण्डी में हों तो यहां की महिलाओं में भी जागरूकता आएगी। रेडियो का चलन ज्यादातर अबूझमाड़ के बड़े गांवों- डूंगा, आदेर, गुदाड़ी, मुरमवाड़ा, कोहकामेटा, करमगांव, गोरसा, हुच्चाकोट, हुच्चाड़ी, हितुलवाड़, कातुरबेड़ा, राये, गवाड़ी, करमरी, कोरकोरसा, पुंगारपाल, खड़कागांव, खुड़पई आदि में है। अलवा गांव की कोताय गावड़े का कहना है कि गर्भावस्था एवं बाल विवाह से जुड़ी जानकारियां यदि गोण्डी में आएं तो यहां होने वाली अकाल मौतों में कमी आएगी।
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